Monday, December 26, 2011

म्याने बस

दिखावे ही को है म्याने बस, तलवार नही है,
कुछ एक है भी तो उनमे भी धार नही है,

चाक-चौबंद जो अपने हथियार रखते हैं,
वो बुजदिल जंग लड़ने को तैयार नही है,

अरसे बाद पिंजरा अगर खुला तो क्या खुला,
परिंदा ही अब उड़ने का तलबगार नही है,

फ़िकराकशी का मौजू और हूँ लुत्फ़ का सामान,
हस्ती मेरी नाकाम सही बेकार नही है,

तुझे पाने की तमन्ना गर गुनाह है कोई,
तो कहो महफ़िल मे कौन गुनहगार नही है,

उसी के दर पे मिलेगा, जाओ तलाश लो,
कई दिनों से महफ़िल मे "बेकरार" नही है

Wednesday, August 10, 2011

थाम लिया होता


जो गिरने से पहले ही मुझे थाम लिया होता.
मैने भी कहाँ अब तक तेरा नाम लिया होता,


मेरे गिरने की संभलने की मिसालें नही बनती,
जो तूने भी मोहब्बत से अगर काम लिया होता,

Monday, August 8, 2011

गरचे जिगर ना हो


मफलिसो, यतीमों पे जिसकी नज़र ना हो
वो अधूरा दौलतमंद है जिसमे सबर ना हो,


दौलत को आता देख कर ईमानदारी ने कहा
शायद अब इस दर पे कभी मेरी कदर ना हो,


वाक़िफ़-ए-हालत हूँ, तभी तो चोट लगती है
साजिशें ऐसी हो तेरी के मुझको खबर ना हो,


रोज बूढ़ी आँखो से रास्ते को तकता है
रोज़ी की खातिर कोई बेटा दर-बदर ना हो,


रवाँ होसले रहे तो कुछ कर जाओगे "बेक़रार"
फौलादी जिस्म भी बेकार है गरचे जिगर ना हो,

Tuesday, August 2, 2011

शाम ढलते ढलते


कल फिर सहर मे होगी, मुलाकात चलते चलते 
सूरज कह गया था ये, शाम ढलते ढलते


पलकों मे समेटे रखा, मरने नही दिया,
ख्वाब सभी सच हो गये आँखों मे पलते पलते,


तासीर थी जुदा मेरी, कुछ तेरा असर हुआ,
पीलापन आ ही जाता है उबटन को मलते मलते


बाति खुद जली, खोया तेल का वज़ूद
रात बहूत मश-हूर हुआ, चिराग जलते जलते,


है "बेक़रार" उदास, शाखों को देख-कर 
वक़्त तो लगता ही है फलों को फलते फलते

Tuesday, July 19, 2011

आम आदमी

बना, बिगड़ा, गिरा, संभला, उठा, बैठा, बहा, बहका
कभी रोया, कभी चहका, कभी खोया कभी महका,
कभी तन्हा कभी मेला, सब तक़दीर का खेला,
सूना समझा, हंसा बोला, कभी माशा कभी तोला,

कभी राशन कभी कपड़े, पानी के लिए झगड़े,
केरोसिन कभी शक्कर, कभी चावल, कभी कंकर,
उधारी वो बानिए की, निकल जाना है फिर छुपकर,
कहाँ खोया मेरा बचपन, कहाँ जवानी गई छूकर,

सर्दी मे कभी ठिठूरा,  कभी गर्मी ने सहमाया,
सपनो ही मे था वो गरम सूट, एसी, कूलर सब ख्वाब रहा,
कभी बच्चों के कपड़ों मे, तो कभी बाबूजी के कंबल मे,
मा के तन से लिपट गया, वो गरम सूट बस ख्वाब रहा,

कभी शादी कभी बच्चे, कभी झूठे कभी सच्चे,
कन्ही मा-बाप मे उलझा, कहीं बीवी ने भर्माया,
कभी दो घूँट मे बहका, कभी यारों ने बहकाया,
कभी दुख भी लगे सुख से, कभी सुख मे भी दुख पाया.

कभी बीवी की बातों मे मा-बाप से उलझा,
कभी मा-बाप की सुन ली बीवी को धमकाया,
कभी बच्चों के झगड़ों मे, कभी स्कूल को लेकर
जो कुछ खुद ना कर पाया, बच्चों से करवाया.


कुछ भी ऐसा कर ना सका, की लोग मुझे फिर याद करे,
मेरे बारे मे भी सोचे, मुझपे कोई बात करे.
मे हूँ एक आम आदमी, बस इतना ही कर पाया हूँ,
सुबह निकला , शाम आया, स्कूलों की फीस भरी,
डांटा डपटा मारा पीटा, फिर आहों की टीस भरी,
दवा-दारू, किराया-पानी,
खाली हाथ चाय पानी,……………………….

Sunday, June 26, 2011

ये किस्से

ये प्यार मोहब्बत, ये इश्क़ों के किस्से,
ये झूठी कहानी, वफ़ाओं के क़िस्से,

बिना दिल को समझे, दिल की ये बातें,
बिना गम को जाने, गमख्वारी के किस्से,

खुद ही की बेवफ़ाई, और तोहमत किसी पे,
ये फिरकापरस्ती के बोझिल से किस्से,

ख़यालों की दुनिया मे जो तुमने बसाए,
उन वीरान मकानो, के टूटे ये हिस्से,

मेरे आँसू-ओं को जो कहते हो झूठा,
तो क्यूँ बने जाते हो, इसी दरिया के हिस्से

खुले दिल से मानो, के तुम भी ग़लत हो,
बिछड़े हुए दिल, मिलेंगे तो फिरसे,

थामा है हाथ मेरा, तो कह दो सभी को
क्यूँ छिपाते हो सच को, दुनिया के डर से,

करो बदज़बानी, मगर सोच लेना,
कभी तुम भी होगे, “बुढ़ापे” के हिस्से

बड़ी मुश्किलों से, पढ़ाया है तुमको,
अब बनो तुम भी उनकी, खुशियों के किस्से

सताओ उसे, चाहे घर से निकालो,
तेरे बच्चे भी है, उसी मा के हिस्से

दुनिया से छुपा लोगे, अपनी ये कमियाँ,
क्या खुद ही से तुम, निकल पाओगे बच के

जो तुझको मिला है, बड़ा कीमती है,
ना खोना इसे झूठी, मर्दानगी के डर से,

Wednesday, June 22, 2011

“काँटे” गुलाब कर दो

यूँ मुस्करा के देखो, “काँटे” गुलाब कर दो
लबों से प्याले छू के, पानी शराब कर दो,

पन्ने कई है खाली, हैं सफे कई अधूरे,
चले आओ ज़िंदगी मे, पूरी किताब कर दो,

Sunday, June 12, 2011

तहज़ीब भी सिखाई होती

हसरत थी इतनी तो थोड़ी हिम्मत भी दिखाई होती
आ ही गये थे बाज़ार मे तो बोली भी लगाई होती,

क्या क्या ना कहता रहा,  नज़रें झुका के वो
सच्चाई थी बातों मे तो नज़रें भी मिलाई होती,

गाँधी-नेहरू की बातें, ठीक है बेटे को सुनाना,
बाप-दादा की कहानी भी कभी उसको सुनाई होती,

मेरी रज़ा को बूझती है खुद की रज़ा से पहले
क्यूँ इतना ख़याल करती अगर बेटियाँ पराई होती,

वज़ूद को यूँ कोसती रही, रात भर शमा
ना मे जलती, ना हम मिलते,  ना जुदाई होती

इतना भी खुला ना छोड़ो, की अफ़सोस हो “बेक़रार”
काश बच्चों को थोड़ी तहज़ीब भी सिखाई होती,

Thursday, June 9, 2011

बिखरना लाजिमी था

बिन धागे के फूलों का बिखरना लाजिमी था,
राहों मे गिरे तो फिर कुचलना लाजिमी था

मुश्किल मे मदद का मुझे हाथ ना मिला,
खुद आप ही मेरा, संभलना लाजिमी था

हर वक़्त जो मुस्कान को होठों पे रखता है
उस शख्स का तन्हाई मे सिसकना लाज़िमी था,

हर रोज दिखाए जाते थे ढेर दौलत के,
चिकनी थी मिट्टी, वहाँ फिसलना लाजिमी था,

मासूम है औकात  का गुमान नही है,
चाँद के लिए बच्चे का मचलना लाजिमी था,

Friday, June 3, 2011

सुन रहे हैं शाहरुख, सलमान और दिग्विजय जी

शाहरूख, सलमान या फिर दिग्विजय सिंग जी.....सभी का कहना है की बाबा रामदेव को सिर्फ़ अपने काम तक ही सीमित रहना चाहिए इससे ज़्यादा किसी और काम मे हाथ नही डालना चाहिए....मैने जब इन महाशयों के ये बयान टीवी पर देखे तो मन मे सवाल उठा की भाई.....एक बाबा जो योग सिखाता है उसने अगर काले धन को देश मे वापस लाने की माँग कर दी तो इसमे ग़लत क्या है? इस देश मे किसी विपक्षी पार्टी ने काले धन को वापसलाने की माँग को इतनी गंभीरता से कभी नही उठाया की सरकार को इस बारे मे सच मे कुछ उचित कार्यवाही करनी पड़े ...बस भाषण मे इसका इस्तेमाल हुआ है.....और जो लोग इंटरनेट का नियमित इस्तेमाल करते हैं उन्हे ज़रूर इस तरह के मैल मिले होंगे की भारत का कितना पैसा बाहर स्विस बॅंक मे जमा है और इस पैसे के वापस आ जाने से कितने काम किए जा सकते हैं, .......आज करोड़ों लोग बाबा के अनुयायी हैं योग की वजह से........और देश मे सभी राजनैतिक पार्टीया काले धन के विषय मे सिवाय बयानबाज़ी के कुछ और करने के मूड मे नही दिख रही......लोग भूख से मार रहे हैं और कुछ लोगों ने इतना पैसा बना लिया है की देश मे रखने की जगह नही.....रखते भी हैं तो स्विस बॅंक मे.....ऐसे हालत मे अगर सक्षम बाबा रामदेव ने इसे वापस लाने का बीड़ा उठाया तो ग़लत क्या है.......मे राजनैतिक जानकारी नही रखता मगर इतना कह सकता हूँ की ...किताबों मे पढ़ा था सत्याग्रह लेकिन अन्ना हज़ारे से पहले किसी राजनैतिक पार्टी के किसी भी नुमैन्दे ने कब सत्याग्रह किया मुझे याद नही......आजकल के नेता कर भी नही सकते..एसी की आदत है...नरम गद्दे चाहिए .....भूखे कैसे रहेंगे?
खैर मेरे कहने का मतलब सिर्फ़ इतना ही है की जब बात देश हित की हो तो चाहे आप कोई भी काम करते हों एक हो जाना चाहिए....और काले धन का मामला तो ऐसा है की हमाम मे सब नंगे तो जाहिर है कोई किसी पर उंगली नही उठाएगा लेकिन किसी को तो सामने आना ही होगा....देश हित सभी का काम है.....इसका या उसका नही..सबका..आपका भी,,,,,,,,, सुन रहे हैं शाहरुख, सलमान और दिग्विजय जी

Thursday, June 2, 2011

रिश्ते

ममता मे पलते हैं, रिश्ते हिमायत के,
औलाद से हैं बाप के रिश्ते हिफ़ाज़त के

तोड़ने से पहले महज इतना ख़याल हो
मुश्किल से बनते हैं रिश्ते मुहब्बत के

भरोसे की कच्ची डोर से बँधे हुए हैं ये
सहेज कर रखना ये रिश्ते नफ़ासत के,

खत मे तुझे “मेरी जान” हर बार लिख  दिया
काग़ज़ पे ही लिखना है, रिश्ते लिखावट के,

मिलने आया है कोई,  कहीं कुछ माँग ही ना ले
मूफलिसो से माने जाते हैं  रिश्ते मुसीबत के

मिलना ही होगा, भले मर्ज़ी नही अपनी
जबरन निभाए जाते हैं,  रिश्ते बनावट के,

रुतबे वालों से हो चाहे, नाम का रिश्ता
खुलकर जताए जाते हैं, रिश्ते दिखावट के,

अभी हैं और भी रिश्ते, रिश्ते बग़ावत के,
कहीं रिश्ते खिलाफत के, कभी रिश्ते सजावट के

Tuesday, May 31, 2011

रातें मेरी गँवार हुई,

सीखा-साखा भूल गया सब, असलियत जब सवार हुई,
दिन था मेरा अदबी-शहरी, रातें मेरी गँवार हुई,

दिल की रह गई दिल मे मेरे, बोल ना फूटे अधरों से,
सुनी-सुनाई सुना दी तुझको, बातें मेरी उधार हुई,

हर बार तेरे सवरने मे, खामी सी लगती थी मुझको,
क्यूँ आज सुबह भीगे तन पर, तेरी बिंदिया ही सिंगार हुई,

तू नही तो घर भी है बोझिल और दुनियाभर तन्हाई है
साथ तेरे घर की सरहद, अब मेरे लिए संसार हुई,

Wednesday, April 20, 2011

असलियत छुपाई लाख


रुख़ बदला हवाओं का, और परदा सरक गया,
असलियत छुपाई लाख, पर चेहरा झलक गया,


ना किर्चेन ही बिखरी, ना आवाज़ कोई आई,
इस अदा से लगी ठेस के बस शीशा दरक गया,


उसी दिन से बे-ईमानी से, कुछ बू सी आने लगी,
जिस दिन बू-ए-ईमान से गिरेबान महक गया,


तर्क-ए-ताल्लुक को लोग, मेरी रज़ा जाने बैठे थे,
एन वक़्त पे आँखों से एक आँसू छलक गया,


सोच और सच मे बस "यक़ीन" के फ़ासले हैं,
कल तस्सवूर किया शराब का, सच मे बहक गया,


खुद से अजनाबीपन की, इंतहा है "बेकरार"
जो आईना देखा तो दिल, बेतरह धड़क गया.

Friday, March 18, 2011

शम्सीरें जैसे ढाल से मिले

मेरे महबूब भी मुझसे कुछ इस हाल से मिले,
मैदान-ए-जंग मे शम्सीरें जैसे ढाल से मिले,

मेरी बुलंदी ही थी शायद दोस्ती की अकेली वज़ह,
वक़्त बदला तो हर नज़र मे कई सवाल से मिले,

छलक गईं उनकी भी आँखें मेरा घर गिरा कर,
जो भीगे से कुछ पत्थर मेरी दीवाल से मिले,

ना मजनू से मेरा जोड़, ना रांझा से मुक़ाबला,
नही ऐसी कोई मिसाल जो मेरी मिसाल से मिले,

आहों मे भी क़हक़हे, अब अज़ीब नही लगते,
कई दीवाने इस बzम मे, हम ख़याल से मिले,

मिलने मिलाने मे भी रहा हैसियत का असर "बेक़रार"
कुछ मलाल से मिले तो कुछ कमाल से मिले,

Monday, February 21, 2011

शीतलता की आस क्यूँ


तपती हुई दुपहरी मे वर्षा का कयास क्यूँ,
उष्णता ही भाग्य है तो शीतलता की आस क्यूँ,


गेरू-आ पहन भी गर राम और अल्लाह हैं दो,
तो लौट आओ समाज मे ये व्यर्थ का सन्यास क्यूँ,


एक -दूजे को देख-कर, हर एक बस ये सोचता है
सभी हैं मगन खुशी मे और में निराश क्यूँ,


मेरा घर रोशनी से हो भले सराबोर मगर,
बगलवाले झोंपडे मे दिए का प्रकाश क्यूँ,


हुए जमाने साथ मे मिल-बैठ के बतियाए हुए
अपनो के लिए कहो अपनत्व का ही नाश क्यूँ,


होते हुए को भूलना आसान है मुश्किल नही,
जो याद आते हैं सदा, होते नही वो पास क्यूँ


सेवा तो तुम कर ना सके, अब चुप तो रहो कपूत मेरे
वृद्धा-वस्था की अवधि का हास क्यूँ परिहास क्यूँ

Sunday, February 20, 2011

काल्पनिक कौवा



कल्पना ही था वो एक,
मुझे बहलाने के लिए,
मा ने गढ़ा था उसे महज़,
मुझे खाना खिलाने के लिए,


अक्सर मेरी ना खाने की ज़िद पे,

मा अपने हाथ से नीवाला बनाती,
एक काल्पनिक कौवा, जो मेरा नीवाला खाने को,
तैयार रहता, उसका डर दिखाती,


और मे कौवे के खाने से पहले,
वो कौर जल्दी से खा लेता,
मा फिर से एक कौर बनाती,
और फिर से एक काल्पनिक कौवा,


ये सिलसिला बरसों चलता रहा,
लेकिन वो काल्पनिक कौवा,
मुझसे कभी जीत नही पाया,
ना ही वो कभी मेरे सामने आया,


मगर अब बरसों बाद,
काम के बोझ की शक्ल मे
अक्सर मेरा नीवाला वो कौवा खा लेता है,
मा, अब वो काल्पनिक कौवा हक़ीक़त है,
अब अक्सर वो जीत जाता है,
और मे हार जाता हूँ

Friday, February 18, 2011

बातें.....


बहूत कर चुका हूँ मे, लबो-रुखसार की बातें,
पलकों की चिलमन की, तेरे दीदार की बातें,
तेरी कम्बख़्त नज़रों के तीरो तलवार की बातें,
गुलशन चमन की फूलों की बहार की बातें


चलो आज करते हैं कुछ घर-संसार की बातें,
बूढ़े बाप की चर्चा, उस बीमार की बातें,
मा के आँचल से बहती रूहानी बयार की बातें
उन बहनो की यादें, उनके दुलार की बातें,


तुम्हारे रुखसार से जाते गुलाबी खुमार की बातें,
हक़ीकत से मुँह चुराते तुम्हारे प्यार की बातें,
चलो मे बंद करता हूँ फिर ये बेकार सी बातें,
लो फिर से करने लगा हूँ मे, झूठे प्यार की बातें,


तेरी कम्बख़्त नज़रों के तीरो तलवार की बातें,
गुलशन चमन की फूलों की बहार की बातें........

Wednesday, February 16, 2011

काँच की बरनी मे रखा आम का आचार



छतों पे बिखरी होती थी पतंगों की बहार,
नीचे बुलाती लालों को, माओं की पूकार,
छुपान-छुपी का खेल, सतोलिये का खुमार,
मंदिर मे प्रसाद के लिए लगाए लंबी कतार
साइकिलों की रेस मे गिरना-उठना बार बार,
टायरों के खेल और धूल के गुबार,
गुलेल छोटी सी शेर चीतों के शिकार
धमाल, मार-धाड़ फिर शर्ट तार तार,
हुआ गली के आवराओं मे अपना भी शुमार,
आईने मे चेहरा अपना ताकना बार बार,
हर शोख हसीना से कम्बख़्त हो जाता था प्यार,
पापा की लानतो से ही फिर उतरता था बुखार,
गर्मी की तपती लू भी लगे बसंती बयार,
हर पल नयी उमंग थी हर दिन था त्योहार,
क्या उम्र थी, क्या ज़ज़्बा था क्या क्या नही था यार,
वो दिन हवा हुए अब ज़िम्मेदारियों की मार,
हर रोज करती है नई मुसीबतें इंतज़ार,
मक्डोनाल्ड का बर्गर खाते हुए याद आ गया,
काँच की बरनी मे रखा आम का आचार

Monday, February 14, 2011

बाज़ार नही मिलते


"सच्चे सौदे" की लिए अब यहाँ, बाज़ार नही मिलते,
सच्चाई और ईमानदारी के, खरीदार नही मिलते,


मेरे अंजाम से बे-खबर, कुछ लोग कह गये,
अब "रांझा, मजनू" से इश्क़ के, तलबगार नही मिलते,


"नव-रत्नो" का सा इल्म रखते है अब भी लोग पर
उन्हे अकबर जैसे शहन्शाओं के, दरबार नही मिलते,


मे रोया शिद्दत से और छलका आसमान भी,
लोग कहते हैं अब "बैजू बावरा" से, फनकार नही मिलते


मसरूफ़ यूँ रहते हैं वो पराए शगल मे,
घर लौटते हैं तो खुद के ही, घर-बार नही मिलते,


तिरछी निगाह का असर, घायल हुए कई,
हसिनाओं के पास अब ये, हथियार नही मिलते


उस रास्ते को सही समझने का गुमान ना करना दोस्त
जिस रह पे सिर्फ़ गुल मिलें, और ख्वार नही मिलते


तसल्ली सी दे गये, दुश्मनो के ये बयान
तुम जैसे रक़ीब जिंदगी मे हर-बार नही मिलते


सारे आम नुमाइश गुनाहों की, साक़ि-शराब की
अब "बेकरार" से सीधे सादे, गुनहगार नही मिलते

Saturday, February 12, 2011

ख़याली बातों से


ख़याली बातों से इश्क़ की आज़माइश ना करो,
नामुमकिन है, चाँद सितारों की फरमाइश ना करो,


मिलो तो फिर यूँ टूट के मिलो हमसे की,
दरमियाँ फिर हवाओं की भी गुंजाइश ना करो,


कम्बख्त आँसू हैं के रुकने का नाम नही लेते,
वो कहते हैं सर-ए-आम, दर्द की नुमाइश ना करो,


जात-पात, दीनो-धरम सिख़ाओ तो "बेकरार"
पर नफ़रतों की नस्ल की पैदाइश ना करो

Friday, February 11, 2011

कुछ तो ज़रूर है


ग़लत क्या है, अगर उन्हे हुस्न पे गुरूर है
इक निगाह ही देखा था मुझे अब तक सुरूर है, 


तुझे छूकर मेरे ख्वाब की तामील हो गई,
चाँद को कैसे छूता, जो कोसों दूर है,


तुम्ही तो सहते रहे हर ज़ुल्म बेआवाज़, 
अब इंतिहा हुई तो, किस्मत का कसूर है,


ना गोलियों की दरकार ना जाम की फरमाइश,
बेफिकर सो रहा है, जो थक के चूर है


बेखयाली मे भी दुपट्टा, सरकने नही देती,
मेरे मोहल्ले की लड़कियों मे अब भी सहूर है


सोच मे पड़ जाता है, जो तेरी ग़ज़ल पढ़े,
तेरी बातों मे "बेकरार" कुछ तो ज़रूर है

Wednesday, January 12, 2011

मेरा नाम, तेरे लब पे, आता तो है

वो खुश है, वो ऐसा जताता तो है,
वो महफ़िल मे सबको हँसता तो है,
हँसी मेरे हिस्से मे आए ना आए,
मुझे कम से कम वो, रुलाता तो है,

वो गैरों की महफ़िल सजाता तो है,
वो महफ़िल मे पीता-पिलाता तो है,
जाम मेरे हिस्से मे, आए ना आए,
ज़हर अपने हिस्से मे आता तो है,

वो महफ़िल मे सबको लुभता तो है,
जमाने से मिलता-मिलता तो है,
वो दर पे मेरे और आए ना आए,
ख्वाबों मे आके जलाता तो है,

मेरी बेवफ़ाई के झूठे ये किस्से,
जमाने मे सबको सुनाता तो है,
मे खुश हूँ के अब तक तेरी महफ़िलों मे
मेरा नाम, तेरे लब पे, आता तो है

Tuesday, January 11, 2011

वक़्त ने तार-तार किए

वक़्त ने तार-तार किए,  आज चेहरे पे नक़ाब नही
तुम्हारे पास सवाल कई, मेरे पास जवाब नही,


इल्ज़ाम तेरे सर-आँखों पर, हर लानत मुझे कबूल 
तसलीम मेरे गुनाहों की, पर तू भी पाक-सॉफ नही,


दावे मुझे समझने के सब, आख़िर झूठे ही निकले,
थोड़ा पेचीदा हूँ मे, कोई खुली किताब नही,


तन्हाई मे समझ सको, जब मेरे बारे मे सोचो
जितना तूने समझा है मे उतना भी खराब नही


बाहर से परखोगे तो खंड-हर सा मुझको पाओगे 
मे अधूरी इमारत सा हूँ, जिस पर कोई मेहराब नही


हौसले की दाद भला, कैसे ना देता “बेकरार”
आज कही सब सच्ची बातें, और हाथ मे शराब नही

Wednesday, January 5, 2011

मीठी मीठी बातों का वो दौर गया

मीठी मीठी बातों का वो दौर गया,
जवानी के आते ही, बचपन छोड़ गया


ताज्जुब है इतने कच्चे थे एहसासों के रिश्ते,
गमों का हल्का सा झोंका ही, उन्हे तोड़ गया,


कहता है जमाना, मेरी दीवानगी को देख-कर,
फरेब-ए-इश्क़ मे लोगों, लो ये एक और गया,


बिल्डिंगो के फ्लॅट मे, कंप्यूटर ने छीन लिया,
मोहल्ले के हुड़दंगी बच्चों का वो शोर गया,


तल्खियाँ और तंज़ अब रोज़ की बातें हैं,
मीठी मीठी बातों का वो दौर गया