Tuesday, May 31, 2011

रातें मेरी गँवार हुई,

सीखा-साखा भूल गया सब, असलियत जब सवार हुई,
दिन था मेरा अदबी-शहरी, रातें मेरी गँवार हुई,

दिल की रह गई दिल मे मेरे, बोल ना फूटे अधरों से,
सुनी-सुनाई सुना दी तुझको, बातें मेरी उधार हुई,

हर बार तेरे सवरने मे, खामी सी लगती थी मुझको,
क्यूँ आज सुबह भीगे तन पर, तेरी बिंदिया ही सिंगार हुई,

तू नही तो घर भी है बोझिल और दुनियाभर तन्हाई है
साथ तेरे घर की सरहद, अब मेरे लिए संसार हुई,