Tuesday, August 2, 2011

शाम ढलते ढलते


कल फिर सहर मे होगी, मुलाकात चलते चलते 
सूरज कह गया था ये, शाम ढलते ढलते


पलकों मे समेटे रखा, मरने नही दिया,
ख्वाब सभी सच हो गये आँखों मे पलते पलते,


तासीर थी जुदा मेरी, कुछ तेरा असर हुआ,
पीलापन आ ही जाता है उबटन को मलते मलते


बाति खुद जली, खोया तेल का वज़ूद
रात बहूत मश-हूर हुआ, चिराग जलते जलते,


है "बेक़रार" उदास, शाखों को देख-कर 
वक़्त तो लगता ही है फलों को फलते फलते

3 comments:

  1. है "बेक़रार" उदास, शाखों को देख-कर
    वक़्त तो लगता ही है फलों को फलते फलते..

    Impressive creation !

    .

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  2. पलकों मे समेटे रखा, मरने नही दिया,
    ख्वाब सभी सच हो गये आँखों मे पलते पलते,

    Khoob kaha..... Bahut sunder likha hai...

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  3. पलकों मे समेटे रखाए मरने नही दिया,
    ख्वाब सभी सच हो गये आँखों मे पलते पलते,

    ख़ूबसूरत ग़ज़ल है।
    हर शेर हक़ीकत को बेबाकी से बयान कर रहा है।

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