Tuesday, March 6, 2012

हुनर कैसे कैसे


फनकार करते हैं अब बसर जैसे तैसे
फ़ना हो चुके हैं हुनर कैसे कैसे

मयकशी, रंजोगम का जवाब बन गई,
दवा बन चुके हैं, ज़हर कैसे कैसे,

जब से मेरे गाँव मे आया है वो शहरी
देखता हूँ सब मे असर कैसे कैसे

फलक का चाँद थे जो, अब तारों मे नही गिनती
ढाती है जिंदगी भी कहर कैसे कैसे

सूखी पलकों को देख, मुझे पत्थर कहने वाले
मैं करता हूँ आसुओं को ज़बर कैसे कैसे

दाम पूछ के ही माँगते हैं खिलोना मुझसे,
मेरे बच्चे भी करते हैं सबर कैसे कैसे

Monday, December 26, 2011

म्याने बस

दिखावे ही को है म्याने बस, तलवार नही है,
कुछ एक है भी तो उनमे भी धार नही है,

चाक-चौबंद जो अपने हथियार रखते हैं,
वो बुजदिल जंग लड़ने को तैयार नही है,

अरसे बाद पिंजरा अगर खुला तो क्या खुला,
परिंदा ही अब उड़ने का तलबगार नही है,

फ़िकराकशी का मौजू और हूँ लुत्फ़ का सामान,
हस्ती मेरी नाकाम सही बेकार नही है,

तुझे पाने की तमन्ना गर गुनाह है कोई,
तो कहो महफ़िल मे कौन गुनहगार नही है,

उसी के दर पे मिलेगा, जाओ तलाश लो,
कई दिनों से महफ़िल मे "बेकरार" नही है

Wednesday, August 10, 2011

थाम लिया होता


जो गिरने से पहले ही मुझे थाम लिया होता.
मैने भी कहाँ अब तक तेरा नाम लिया होता,


मेरे गिरने की संभलने की मिसालें नही बनती,
जो तूने भी मोहब्बत से अगर काम लिया होता,

Monday, August 8, 2011

गरचे जिगर ना हो


मफलिसो, यतीमों पे जिसकी नज़र ना हो
वो अधूरा दौलतमंद है जिसमे सबर ना हो,


दौलत को आता देख कर ईमानदारी ने कहा
शायद अब इस दर पे कभी मेरी कदर ना हो,


वाक़िफ़-ए-हालत हूँ, तभी तो चोट लगती है
साजिशें ऐसी हो तेरी के मुझको खबर ना हो,


रोज बूढ़ी आँखो से रास्ते को तकता है
रोज़ी की खातिर कोई बेटा दर-बदर ना हो,


रवाँ होसले रहे तो कुछ कर जाओगे "बेक़रार"
फौलादी जिस्म भी बेकार है गरचे जिगर ना हो,

Tuesday, August 2, 2011

शाम ढलते ढलते


कल फिर सहर मे होगी, मुलाकात चलते चलते 
सूरज कह गया था ये, शाम ढलते ढलते


पलकों मे समेटे रखा, मरने नही दिया,
ख्वाब सभी सच हो गये आँखों मे पलते पलते,


तासीर थी जुदा मेरी, कुछ तेरा असर हुआ,
पीलापन आ ही जाता है उबटन को मलते मलते


बाति खुद जली, खोया तेल का वज़ूद
रात बहूत मश-हूर हुआ, चिराग जलते जलते,


है "बेक़रार" उदास, शाखों को देख-कर 
वक़्त तो लगता ही है फलों को फलते फलते

Tuesday, July 19, 2011

आम आदमी

बना, बिगड़ा, गिरा, संभला, उठा, बैठा, बहा, बहका
कभी रोया, कभी चहका, कभी खोया कभी महका,
कभी तन्हा कभी मेला, सब तक़दीर का खेला,
सूना समझा, हंसा बोला, कभी माशा कभी तोला,

कभी राशन कभी कपड़े, पानी के लिए झगड़े,
केरोसिन कभी शक्कर, कभी चावल, कभी कंकर,
उधारी वो बानिए की, निकल जाना है फिर छुपकर,
कहाँ खोया मेरा बचपन, कहाँ जवानी गई छूकर,

सर्दी मे कभी ठिठूरा,  कभी गर्मी ने सहमाया,
सपनो ही मे था वो गरम सूट, एसी, कूलर सब ख्वाब रहा,
कभी बच्चों के कपड़ों मे, तो कभी बाबूजी के कंबल मे,
मा के तन से लिपट गया, वो गरम सूट बस ख्वाब रहा,

कभी शादी कभी बच्चे, कभी झूठे कभी सच्चे,
कन्ही मा-बाप मे उलझा, कहीं बीवी ने भर्माया,
कभी दो घूँट मे बहका, कभी यारों ने बहकाया,
कभी दुख भी लगे सुख से, कभी सुख मे भी दुख पाया.

कभी बीवी की बातों मे मा-बाप से उलझा,
कभी मा-बाप की सुन ली बीवी को धमकाया,
कभी बच्चों के झगड़ों मे, कभी स्कूल को लेकर
जो कुछ खुद ना कर पाया, बच्चों से करवाया.


कुछ भी ऐसा कर ना सका, की लोग मुझे फिर याद करे,
मेरे बारे मे भी सोचे, मुझपे कोई बात करे.
मे हूँ एक आम आदमी, बस इतना ही कर पाया हूँ,
सुबह निकला , शाम आया, स्कूलों की फीस भरी,
डांटा डपटा मारा पीटा, फिर आहों की टीस भरी,
दवा-दारू, किराया-पानी,
खाली हाथ चाय पानी,……………………….

Sunday, June 26, 2011

ये किस्से

ये प्यार मोहब्बत, ये इश्क़ों के किस्से,
ये झूठी कहानी, वफ़ाओं के क़िस्से,

बिना दिल को समझे, दिल की ये बातें,
बिना गम को जाने, गमख्वारी के किस्से,

खुद ही की बेवफ़ाई, और तोहमत किसी पे,
ये फिरकापरस्ती के बोझिल से किस्से,

ख़यालों की दुनिया मे जो तुमने बसाए,
उन वीरान मकानो, के टूटे ये हिस्से,

मेरे आँसू-ओं को जो कहते हो झूठा,
तो क्यूँ बने जाते हो, इसी दरिया के हिस्से

खुले दिल से मानो, के तुम भी ग़लत हो,
बिछड़े हुए दिल, मिलेंगे तो फिरसे,

थामा है हाथ मेरा, तो कह दो सभी को
क्यूँ छिपाते हो सच को, दुनिया के डर से,

करो बदज़बानी, मगर सोच लेना,
कभी तुम भी होगे, “बुढ़ापे” के हिस्से

बड़ी मुश्किलों से, पढ़ाया है तुमको,
अब बनो तुम भी उनकी, खुशियों के किस्से

सताओ उसे, चाहे घर से निकालो,
तेरे बच्चे भी है, उसी मा के हिस्से

दुनिया से छुपा लोगे, अपनी ये कमियाँ,
क्या खुद ही से तुम, निकल पाओगे बच के

जो तुझको मिला है, बड़ा कीमती है,
ना खोना इसे झूठी, मर्दानगी के डर से,